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बिहार टेंडर घोटाला: रिशु श्री नेटवर्क का काला साम्राज्य बेनकाब, अफसरों की कुर्सी तक फैला भ्रष्टाचार

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बिहार टेंडर घोटाले में रिशु श्री नेटवर्क का बड़ा खुलासा। SVU जांच में अफसरों की मिलीभगत, टेंडर कमीशन, नकद बरामदगी और पोस्टिंग में पैसों के लेनदेन के गंभीर आरोप सामने आए।

पटना/आलम की खबर:बिहार में सरकारी टेंडरों को लेकर एक ऐसा बड़ा घोटाला सामने आया है, जिसने पूरे प्रशासनिक और निर्माण विभागीय तंत्र को हिला कर रख दिया है। स्पेशल विजिलेंस यूनिट (SVU) और अन्य जांच एजेंसियों की लगातार कार्रवाई के बाद यह साफ होता जा रहा है कि टेंडर माफिया रिशु श्री के नेतृत्व में एक संगठित नेटवर्क वर्षों से सरकारी परियोजनाओं को प्रभावित कर रहा था। यह नेटवर्क केवल ठेकों तक सीमित नहीं था, बल्कि इसमें अधिकारियों की पोस्टिंग, ट्रांसफर, टेंडर आवंटन और कमीशनखोरी तक की गहरी जड़ें जुड़ी हुई थीं।

जांच एजेंसियों के अनुसार यह पूरा मामला किसी एक व्यक्ति या एक विभाग तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एक संगठित प्रणाली के रूप में काम कर रहा था, जिसमें ठेकेदार, इंजीनियर, विभागीय अधिकारी और बिचौलिए सभी शामिल थे। सरकारी विकास योजनाओं के नाम पर चल रहे करोड़ों रुपये के टेंडरों में भारी अनियमितताओं के संकेत मिले हैं।

SVU की कार्रवाई में वित्त विभाग, भवन निर्माण विभाग और बुडको जैसे महत्वपूर्ण विभागों से जुड़े कई बड़े अधिकारियों के नाम सामने आए हैं। इनमें वित्त विभाग के संयुक्त सचिव मुमुक्षु चौधरी, भवन निर्माण विभाग के पूर्व चीफ इंजीनियर तारिणी दास और बुडको के एग्जीक्यूटिव इंजीनियर उमेश कुमार सिंह जैसे अधिकारी शामिल हैं, जिन पर गंभीर भ्रष्टाचार और कमीशनखोरी के आरोप लगाए गए हैं।

जांच में यह बात सामने आई है कि रिशु श्री केवल एक ठेकेदार नहीं था, बल्कि वह एक ऐसा प्रभावशाली नेटवर्क संचालित करता था जो सरकारी तंत्र के भीतर तक पैठ बना चुका था। आरोप है कि उसकी पहुंच इतनी मजबूत थी कि वह अधिकारियों की पोस्टिंग तक प्रभावित कर सकता था। सीतामढ़ी और सहरसा जैसे जिलों में पदस्थापना और टेंडर आवंटन में उसकी भूमिका की जांच की जा रही है।

सूत्रों के अनुसार वर्ष 2022 के आसपास एक अधिकारी की नगर निगम में नियुक्ति के पीछे भी इसी नेटवर्क की भूमिका सामने आई है। जांच एजेंसियों को मिले डिजिटल साक्ष्य, विशेष रूप से व्हाट्सएप चैट, इस पूरे घोटाले को समझने में अहम साबित हुए हैं। चैट में कथित रूप से पोस्टिंग और टेंडर को लेकर पैसों के लेन-देन और सिफारिशों की चर्चा दर्ज पाई गई है।

सबसे चौंकाने वाला पहलू यह है कि जांच में यह भी सामने आया कि कई अधिकारियों की नियुक्तियां और स्थानांतरण बेहद संयोगपूर्ण तरीके से तय समय पर हुए, जिससे जांच एजेंसियों का शक और गहरा गया। कुछ मामलों में यह भी दावा किया गया कि पोस्टिंग के लिए लाखों रुपये तक का लेन-देन हुआ।

टेंडर प्रक्रिया में भी भारी गड़बड़ी के आरोप हैं। एल-1, एल-2 और एल-3 श्रेणी की निविदाओं में पारदर्शिता की कमी पाई गई और कई ठेके एक ही नेटवर्क से जुड़ी कंपनियों को दिए जाने की बात सामने आई है। सीतामढ़ी और सहरसा में नगर निगम से जुड़े कई प्रोजेक्ट्स को लेकर गंभीर सवाल उठे हैं, जिनमें छठ घाट निर्माण और रखरखाव जैसे कार्य शामिल हैं।

छापेमारी के दौरान कई अधिकारियों के ठिकानों से बड़ी मात्रा में नकदी और संदिग्ध दस्तावेज बरामद हुए हैं। भवन निर्माण विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी के आवास से मिली फाइलों में कमीशन वितरण का पूरा रिकॉर्ड होने की बात सामने आई है, जिसमें यह दर्शाया गया था कि किस स्तर के अधिकारी को कितने प्रतिशत कमीशन दिया जाना है।

इसी तरह बुडको से जुड़े एक इंजीनियर के मामले में भी डिजिटल चैट के आधार पर यह आरोप सामने आया कि टेंडर राशि का तय प्रतिशत कमीशन के रूप में पहुंचाया जाता था। इसके बाद हुई छापेमारी में नकद बरामदगी ने जांच एजेंसियों की आशंका को और मजबूत कर दिया है।

जांच में यह भी सामने आ रहा है कि यह पूरा नेटवर्क वर्षों से सक्रिय था और सरकारी परियोजनाओं के नाम पर बड़े पैमाने पर वित्तीय अनियमितताएं की जा रही थीं। कई टेंडरों की फाइलें अब जांच एजेंसियों के रडार पर हैं और उनकी विस्तृत जांच जारी है।

सूत्रों का कहना है कि यह कार्रवाई अभी शुरुआती चरण में है और आने वाले दिनों में और भी बड़े नाम सामने आ सकते हैं। कई अन्य इंजीनियर, अधिकारी और बिचौलियों की भूमिका की भी जांच की जा रही है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह पूरा नेटवर्क प्रमाणित होता है, तो यह बिहार के सबसे बड़े टेंडर घोटालों में से एक माना जाएगा, जिसका प्रभाव राज्य की प्रशासनिक व्यवस्था और विकास परियोजनाओं पर लंबे समय तक रहेगा।

बिहार टेंडर घोटाला इस बात का गंभीर उदाहरण है कि जब प्रशासनिक निगरानी कमजोर पड़ती है, तो विकास योजनाएं भ्रष्टाचार के नेटवर्क में बदल सकती हैं। यह मामला केवल कुछ अधिकारियों या ठेकेदारों तक सीमित नहीं दिखता, बल्कि इसमें एक संगठित व्यवस्था की झलक मिलती है।

सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि टेंडर, जो सार्वजनिक धन के उपयोग का सबसे पारदर्शी माध्यम माना जाता है, वही भ्रष्टाचार का केंद्र बन गया। यदि पोस्टिंग, टेंडर और कमीशन एक ही नेटवर्क से नियंत्रित होने लगें, तो यह लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए गंभीर खतरा है।

जांच एजेंसियों की कार्रवाई निश्चित रूप से सराहनीय है, लेकिन इस तरह के मामलों में केवल गिरफ्तारी पर्याप्त नहीं होती। सिस्टम में संरचनात्मक सुधार और निगरानी तंत्र को मजबूत करना भी उतना ही जरूरी है।

यह मामला आने वाले समय में यह तय करेगा कि बिहार में प्रशासनिक सुधार किस दिशा में जाएगा और क्या वास्तव में पारदर्शिता स्थापित हो पाएगी या नहीं।

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